Rajasthan बहन के साथ जंगल में बकरी खोजने गया था मासूम, अचानक सामने आ गया लेपर्ड, जानिए फिर क्या हुआ?
मौत के जबड़े से जिंदगी की जंग, जब जंगल में 10 साल के मासूम का सामना हुआ खूंखार तेंदुए से!

Rajasthan के मेहंदीपुर बालाजी के जंगलों में 5 घंटे तक थमी रही सांसें, झाड़ियों में दुबके बालक ने कैसे दी मौत को मात?कहते हैं कि ‘जाको राखे साइयां, मार सके न कोय’। यह कहावत दौसा जिले के मेहंदीपुर बालाजी क्षेत्र के डैडान गांव में उस समय सच साबित हुई, जब एक 10 साल का मासूम करीब पांच घंटे तक यमराज रूपी तेंदुए की आंखों के सामने रहा, लेकिन अपनी सूझबूझ और किस्मत के दम पर मौत को मात दे दी। यह कहानी सिर्फ एक रेस्क्यू ऑपरेशन की नहीं है, बल्कि एक बच्चे के अदम्य साहस और ग्रामीणों की एकजुटता की मिसाल है।
वह खौफनाक सुबह: बकरी की तलाश और तेंदुए की आहट
घटना की शुरुआत शनिवार शाम को हुई थी, जब गांव के विशु प्रजापत की एक बकरी पहाड़ी इलाके में चरते समय गुम हो गई थी। रविवार की सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही 10वीं कक्षा का छात्र दिलकुश अपनी बहन के साथ पहाड़ी की ओर निकल पड़ा। उन्हें उम्मीद थी कि शायद उनकी बकरी कहीं झाड़ियों में फंसी होगी।
पहाड़ी की ऊंचाइयों पर चढ़ते ही नजारा बदल गया। सन्नाटे के बीच झाड़ियों के पीछे उन्हें अपनी बकरी का कंकाल मिला। उसे देखते ही दोनों भाई-बहन के पैर जम गए। खून से लथपथ अवशेष इस बात का सबूत थे कि इलाके में कोई शिकारी जानवर मौजूद है। इससे पहले कि दिलकुश कुछ समझ पाता, झाड़ियों में सरसराहट हुई। मासूम की नजरें जैसे ही सामने पड़ीं, उसकी रूह कांप उठी—सामने साक्षात मौत खड़ी थी। पीले बदन पर काले धब्बे और चमकती हुई हिंसक आंखें… एक आदमखोर तेंदुआ वहां मौजूद था।
पलक झपकते ही ओझल हुआ मासूम, गांव में फैला सन्नाटा
जैसे ही तेंदुए ने गुर्राहट की, दिलकुश की बहन डर के मारे चिल्लाती हुई नीचे की ओर भागी। लेकिन जब उसने पीछे मुड़कर देखा, तो दिलकुश वहां नहीं था। उसे लगा कि तेंदुए ने उसके भाई को उठा लिया है। बदहवास बहन ने गांव पहुंचकर जैसे ही यह खबर सुनाई, पूरे डैडान गांव में कोहराम मच गया। देखते ही देखते लाठी-डंडों के साथ सैकड़ों ग्रामीण पहाड़ी की ओर दौड़ पड़े।मेहंदीपुर बालाजी थाना पुलिस और वन विभाग को सूचित किया गया। मामला संवेदनशील था क्योंकि एक छोटे बच्चे की जान दांव पर थी। हर बीतता मिनट परिजनों के दिल की धड़कनें बढ़ा रहा था। माँ का रो-रोकर बुरा हाल था और वह बार-बार बस एक ही गुहार लगा रही थी—”मेरे लाल को वापस ला दो।”
5 घंटे का महा-सर्च ऑपरेशन: पुलिस, प्रशासन और ग्रामीणों की जंग
सूचना मिलते ही पुलिस बल और वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। रेंजर सतीश मीणा के नेतृत्व में टीमों का गठन किया गया। पहाड़ी का इलाका पथरीला और घनी कंटीली झाड़ियों से भरा था, जहाँ तेंदुए का छिपना बेहद आसान थाड्रोन कैमरे तो नहीं थे, लेकिन इंसानी जज्बा आसमान छू रहा था। ग्रामीणों ने घेरा बनाकर झाड़ियों को खंगालना शुरू किया। करीब साढ़े पांच घंटे तक पूरा इलाका एक छावनी में तब्दील रहा। हर गुफा, हर पत्थर के पीछे दिलकुश को पुकारा जा रहा था, लेकिन जवाब में सिर्फ सन्नाटा और हवाओं की सरसराहट मिल रही थी। डर इस बात का था कि कहीं तेंदुआ बच्चे को गहरी गुफा में न ले गया हो।
झाड़ियों में बेसुध मिला ‘नन्हा योद्धा’
तलाश करते-करते रेस्क्यू टीम एक घनी झाड़ी के पास पहुंची। वहां अचानक किसी के सुबकने की आवाज सुनाई दी। जब झाड़ियों को हटाकर देखा गया, तो वहां दिलकुश दुबका हुआ बैठा था। वह डर के मारे इतना सहम गया था कि उसकी आवाज गले में ही फंस गई थी। वह पसीने से तर-बतर और लगभग बेसुध हो चुका था।पुलिस और ग्रामीणों ने तुरंत उसे गोद में उठाया और नीचे लेकर आए। जैसे ही वह सुरक्षित गांव पहुंचा, लोगों की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।
मासूम की जुबानी: “वह मेरे बहुत करीब था”
होश में आने के बाद दिलकुश ने जो बताया, उसे सुनकर सबकी रूह कांप गई। दिलकुश ने बताया, “जैसे ही मैंने बकरी का कंकाल देखा, तेंदुआ झाड़ियों से निकलकर मेरी तरफ बढ़ा। मैं इतना डर गया कि भागने की हिम्मत नहीं हुई। मैं पास की एक गहरी और घनी झाड़ी के भीतर घुसकर पत्थर की तरह जम गया। तेंदुआ कुछ देर तक वहीं आसपास घूमता रहा, मुझे उसकी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। डर के मारे मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं और भगवान को याद करने लगा। फिर मुझे पता नहीं चला कि मैं कब बेहोश हो गया।”
प्रशासन की चेतावनी: पहाड़ी इलाकों में न जाएं अकेले
रेस्क्यू के बाद दिलकुश को प्राथमिक उपचार के लिए सिकराय अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे खतरे से बाहर बताया। वन विभाग के रेंजर सतीश मीणा ने कहा कि इस क्षेत्र में तेंदुए की सक्रियता बढ़ गई है। उन्होंने ग्रामीणों से अपील की है कि:
अकेले या बच्चों के साथ पहाड़ी और जंगली इलाकों में न जाएं।
मवेशियों को चराने के लिए सुरक्षित स्थानों का चुनाव करें।
रात के समय घरों के बाहर रोशनी रखें और सतर्क रहें।
निष्कर्ष: यह घटना हमें याद दिलाती है कि प्रकृति और वन्यजीवों के बीच रहते हुए सावधानी कितनी जरूरी है। दिलकुश की किस्मत अच्छी थी कि वह सुरक्षित लौट आया, लेकिन यह पूरे क्षेत्र के लिए एक बड़ी चेतावनी है।














