Ram Lalla 76 साल पहले अयोध्या में इतिहास ने ली थी करवट, विवादित परिसर में प्रकट हुए थे रामलला
22 दिसंबर 1949 रामलला के 'प्राकट्य' की वह अलौकिक रात, जिसने राम मंदिर आंदोलन की नींव को सदैव के लिए अमर कर दिया।

Ram Lalla 77वां प्राकट्योत्सव 22 दिसंबर 1949 की वह सर्द रात, सरयू का तट और अब्दुल बरकत की वह गवाही
अयोध्या: आज जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर अपनी दिव्यता बिखेर रहा है, तब इतिहास के झरोखे से वह तारीख निकलकर सामने आती है जिसने करोड़ों हिंदुओं की आस्था को एक निर्णायक मोड़ दिया था। आज से ठीक 76 वर्ष पूर्व, 22 और 23 दिसंबर 1949 की वह दरम्यानी रात थी। कड़ाके की ठंड, पौष का महीना और सरयू की लहरों से उठती बर्फीली हवाएं—लेकिन अयोध्या की नियति कुछ और ही लिखने जा रही थी।

सरयू स्नान और वह रहस्यमयी टोकरी
पूस की उस ठिठुरती रात में, जब पूरी दुनिया सो रही थी, लक्ष्मण किला घाट के पास पांच साधुओं ने सरयू के शीतल जल में डुबकी लगाई। इन साधुओं की आंखों में एक संकल्प था और हाथों में एक पवित्र जिम्मेदारी। इनमें से एक साधु के सिर पर बांस की एक साधारण सी टोकरी थी। किसी को आभास नहीं था कि उस टोकरी में साक्षात ‘रामलला’ विराजमान हैं। अष्टधातु की वह बाल स्वरूप मूर्ति, जिसे मंत्रोच्चार के बीच विवादित परिसर के मुख्य गुंबद के नीचे सिंहासन पर स्थापित किया गया।

हवलदार अब्दुल बरकत की वह ‘अलौकिक’ गवाही
इस घटना का सबसे भावुक और अविश्वसनीय पहलू एक मुस्लिम हवलदार की गवाही है। उस रात 12 बजे से हवलदार अब्दुल बरकत की ड्यूटी वहां लगी थी। हालांकि, बरकत अपनी ड्यूटी पर थोड़ा देरी से, करीब डेढ़ बजे पहुंचे। जब उनसे देरी का कारण पूछा गया और जो उन्होंने एफआईआर में दर्ज कराया, वह आज भी रोंगटे खड़े कर देता है। अब्दुल बरकत ने बताया कि रात के सन्नाटे में अचानक एक ‘दिव्य और अलौकिक रोशनी’ चमकी। रोशनी इतनी तेज थी कि आंखें चौंधिया गईं। जब प्रकाश कम हुआ, तो उन्होंने देखा कि वहां भगवान की मूर्ति विराजमान थी। एक मुस्लिम सिपाही द्वारा चमत्कार की इस पुष्टि ने इस घटना को केवल एक धार्मिक कृत्य से ऊपर उठाकर एक ‘दैवीय संकेत’ बना दिया।
सिटी मजिस्ट्रेट का त्याग और ऐतिहासिक निर्णय
जब दिल्ली तक इस घटना की गूंज पहुंची, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को मूर्तियां तुरंत हटाने का सख्त निर्देश दिया। लेकिन नियति ने इस कार्य के लिए सिटी मजिस्ट्रेट ठाकुर गुरुदत्त सिंह को चुना था। जब उन पर दबाव बनाया गया, तो उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी। उन्होंने रिपोर्ट दी कि मूर्तियां हटाने से बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क सकती है। दबाव बढ़ा तो उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन जाने से पहले दो ऐसे आदेश किए जो आगे चलकर राम मंदिर की मुक्ति का कानूनी आधार बने:
परिसर को धारा 145 के तहत कुर्क किया, ताकि कोई मूर्तियों को छू न सके।
रामलला के भोग-प्रसाद और नियमित पूजन का अधिकार हिंदुओं को दे दिया।
77वां प्राकट्योत्सव: आस्था का अनवरत प्रवाह
राम जन्मभूमि सेवा समिति वर्ष 1949 से ही इस दिन को ‘प्राकट्योत्सव’ के रूप में मनाती आ रही है। इस वर्ष 23 दिसंबर को 77वां उत्सव मनाया जाएगा। यह केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि उस धैर्य और प्रतीक्षा की याद है जो 500 वर्षों के संघर्ष के बाद सफल हुई।
आज जब भक्त भव्य मंदिर में रामलला के दर्शन करते हैं, तो उन्हें उस सर्द रात की याद जरूर आती है, जब टेंट और सलाखों के बीच ‘लला’ पहली बार प्रकट हुए थे। वह एक ऐसी रात थी जिसने भारत की सांस्कृतिक चेतना को जगा दिया और साबित कर दिया कि सत्य को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता। जय श्री राम!














