Cars24 ने जलभराव में नाव उतारकर किया मार्केटिंग स्टंट, पब्लिसिटी के लिए फर्जी चालान का ड्रामा करके मांगी माफी
अटेंशन पाने के लिए किस हद तक गिरेंगी कंपनियाँ? पुलिस द्वारा दावे को फर्जी बताने के बाद कंपनी ने अपनी गलती स्वीकार कर बिना शर्त माफी जारी की।

Cars24/गुरुग्राम : आज के डिजिटल दौर में ‘अटेंशन’ (ध्यान) पाना ही सबसे बड़ा व्यापार बन चुका है। इसके लिए कंपनियाँ किस ओछे स्तर पर उतर सकती हैं, इसका ताजा और शर्मनाक उदाहरण गुरुग्राम से सामने आया है। हाल ही में गुरुग्राम के जलभराव में ‘Cars24’ नामक ऑटो-टेक कंपनी ने अपनी मार्केटिंग के लिए सड़कों पर नाव उतार दी। यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन हद तब हो गई जब कंपनी की ब्रांड और क्रिएटिव हेड ने लिंक्डइन पर एक झूठी कहानी गढ़ दी कि पुलिस ने इस स्टंट के लिए उन पर ₹50,000 का चालान ठोका है।
कहानी वायरल हुई, चर्चा बनी और कंपनी को जो अटेंशन चाहिए था, वह मिल गया। लेकिन जब गुरुग्राम ट्रैफिक पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए इस दावे को पूरी तरह फर्जी करार दिया

गुरुग्राम ट्रैफिक पुलिस ने कार्रवाई का रुख अपनाया, तो कंपनी के सुर तुरंत बदल गए। रातों-रात सफाई आई कि “₹50,000 चालान के नहीं, बल्कि कैंपेन के खर्च थे।” इसके बाद कंपनी ने घुटने टेकते हुए पुलिस और जनता से ‘बिना शर्त’ माफी माँग ली।

सवाल यह उठता है: क्या सिर्फ एक माफीनामा उस नुकसान की भरपाई कर सकता है जो प्रशासनिक व्यवस्था की साख को पहुँचा है?
Cars24 का घटिया पब्लिसिटी का ‘सस्ता फॉर्मूला’: रायता फैलाओ और माफी माँग लो
यह कोई पहली बार नहीं है जब किसी ब्रांड ने इस तरह का हथकंडा अपनाया हो। आजकल कंपनियों का एक तय पैटर्न बन चुका है—
संसनी फैलाओ और व्यूज बटोरो: कानून और नियम-कायदों की धज्जियाँ उड़ाकर ऐसा कंटेंट बनाओ जो वायरल हो जाए।
प्रशासन को कटघरे में खड़ा करो: पुलिस या व्यवस्था पर झूठे आरोप लगाकर खुद को ‘पीड़ित’ की तरह पेश करो ताकि जनता की हमदर्दी मिले।
पकड़े जाने पर ‘माफी’ का ड्रामा करो: जब बात कानूनी कार्रवाई पर आ जाए, तो एक कॉरपोरेट लेटरहेड पर “बिना शर्त माफी” का नोट जारी कर दो।
कंपनी ने अपनी पब्लिसिटी तो बटोर ली, लेकिन इस पूरे ड्रामे में गुरुग्राम ट्रैफिक पुलिस की छवि जो धूमिल हुई, उसकी भरपाई कौन करेगा? दिन-रात सड़कों पर मुस्तैद रहने वाली पुलिस को केवल अपने ब्रांड के प्रमोशन के लिए ‘विलेन’ बनाकर पेश कर दिया गया।
आग में घी डालने का काम कर रही है ‘गैर-जिम्मेदार मीडिया’
इस पूरे फर्जीवाड़े को बड़ा बनाने में सिर्फ कंपनी ही गुनहगार नहीं है, बल्कि देश के एक प्रमुख राष्ट्रीय अखबार की सोशल मीडिया साइट भी बराबर की जिम्मेदार है।
खबर की पुष्टि (Fact Check) किए बिना, सिर्फ वायरल होने की होड़ में उस राष्ट्रीय मीडिया घराने ने इस झूठी खबर को तुरंत अपने प्लेटफॉर्म्स पर पब्लिश कर दिया। उन्होंने जलती आग में घी डालने का काम किया ताकि उनके पेज पर भी व्यूज और क्लिक्स आ सकें।
अब कड़े कदम उठाने का वक्त है
अगर ऐसे मामलों में सिर्फ ‘माफीनामे’ को स्वीकार करके कंपनियों को छोड़ दिया गया, तो कल को कोई भी ब्रांड अपनी पब्लिसिटी के लिए कानून, पुलिस और प्रशासन का मज़ाक बनाएगा।
सस्ते अटेंशन के लिए प्रशासनिक संस्थाओं की छवि से खिलवाड़ करने वाली ऐसी कंपनियों और बिना पुष्टि के झूठी खबरें फैलाने वाले मीडिया संस्थानों पर सख्त कानूनी और वित्तीय कार्रवाई होना बेहद जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई भी ‘वायरल’ होने के लिए झूठ की नाव पर सवार न हो सके।
