Sholay Film की शूटिंग के दौरान जमीन पर बैठकर इकट्ठे खाना खाते थे सभी सुपरस्टार

Sholay Film रामगढ़ की पहाड़ियों में दिखा सादगी का वो दौर, जहाँ 'स्टारडम' से बड़ा था 'टीमवर्क'

Sholay Film :

भारतीय सिनेमा के पन्नों में ‘शोले’ एक ऐसी सुनहरी कहानी है, जिसकी चमक 50 साल बाद भी फीकी नहीं पड़ी। लेकिन इस फिल्म की महानता केवल इसके संवादों या गब्बर के खौफ में नहीं थी, बल्कि उस सादगी में थी जो कैमरे के पीछे रामनगरम की पहाड़ियों में हर रोज दिखती थी।

जमीन पर बिछती थी टाट और सजती थी कतार आज के दौर में जहां सुपरस्टार्स के लिए सेट पर फाइव स्टार होटलों से खाना आता है, वहीं 1973-75 के दौरान शोले के सेट पर नज़ारा बिल्कुल अलग था। शोले की शूटिंग के दौरान की सबसे खास बात यह थी कि वहां कोई ‘VIP कल्चर’ नहीं था। दोपहर की शूटिंग से ब्रेक मिलते ही पत्थर की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर साधारण कालीन या टाट बिछा दी जाती थी। अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, संजीव कुमार, हेमा मालिनी और अमजद खान जैसे दिग्गज सितारे बिना किसी हिचकिचाहट के उसी कालीन पर बैठ जाते थे। उनके बगल में फिल्म का कैमरा चलाने वाला तकनीशियन होता था और दूसरी तरफ लाइट पकड़ने वाला स्पॉटबॉय।

Sholay Film Pic

सादगी जिसने फिल्म को ‘अमर’ बना दिया जानकार बताते हैं कि उस समय कोई ‘वैनिटी वैन’ नहीं थी। चिलचिलाती धूप और धूल के बीच सभी कलाकार एक ही जैसा खाना खाते थे। इस सामूहिक भोजन का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि जय-वीरू की जो दोस्ती हमें स्क्रीन पर दिखी, उसकी जड़ें उन्हीं लंच ब्रेक की बातों में छिपी थीं, धूल और मिट्टी के बीच बैठकर खाना खाने से कलाकार खुद को ‘रामगढ़’ के गांव का हिस्सा ही समझने लगे थे।

रामनगरम: जहाँ पत्थर भी ‘गब्बर’ की गूँज सुनाते हैं

बेंगलुरु और मैसूर के बीच स्थित रामनगरम की वे चट्टानें आज ‘शोले हिल्स’ के नाम से मशहूर हैं। निर्देशक रमेश सिप्पी ने इस पथरीले इलाके को ऐसा रूप दिया कि लोग भूल ही गए कि यह कोई सेट है। ढाई साल की कड़ी मेहनत के दौरान वहां एक पूरा गांव बसाया गया, सड़कें बनाई गईं और यहाँ तक कि शूटिंग के बाद उस इलाके का एक हिस्सा ‘सिप्पी नगर’ कहलाया। आज भी पर्यटक वहां जय-वीरू की मोटरसाइकिल और गब्बर के चट्टानी ठिकाने को ढूंढते पहुँचते हैं।

वैनिटी वैन बनाम सादगी: बदलता बॉलीवुड

आज की फिल्म इंडस्ट्री में सुविधाएं चरम पर हैं। हर बड़े स्टार के पास अपना डाइट चार्ट, ब्रांड टाई-अप और आलीशान वैनिटी वैन है। बेशक, तकनीक ने काम आसान किया है, लेकिन कहीं न कहीं वह ‘सामूहिकता’ कम होती दिख रही है जो शोले के सेट पर थी।

“शोले का अनुभव हमें सिखाता है कि सिनेमा केवल बड़ी स्क्रीन या महंगे कैमरों से नहीं, बल्कि कलाकारों के समर्पण, अनुशासन और भावनाओं से महान बनता है।”

Manu Mehta

मनु मेहता पिछले लगभग 18 वर्षों से गुरुग्राम की पत्रकारिता में सक्रिय एक अनुभवी और विश्वसनीय पत्रकार हैं। उन्होंने कई बड़े नेशनल न्यूज़ चैनलों (ANI News, News Express, TV 9,… More »
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