Bachelor Village भारत का कुंवारा गाँव, जंहा ब्याह की उम्मीद में बूढ़े हो गए है लोग, “कुंवारों का गांव”
कुंवारो के नाम से मशहूरी के कारण नहीं आती महिलाए

Bachelor Village/Patna(Bihar) कैमूर (बिहार): आधुनिक भारत में जहाँ हम डिजिटल क्रांति और 5G की बात कर रहे हैं, वहीं बिहार के कैमूर जिले में एक ऐसा गाँव है जहाँ आज भी ‘शहनाई’ बजना किसी चमत्कार से कम नहीं है। जिला मुख्यालय भभुआ से करीब 40 किमी दूर पहाड़ियों पर बसा बरवां कलां गाँव आज पूरे देश में “कुंवारों के गाँव” के नाम से कुख्यात हो चुका है।
क्या है असलियत? (Fact Check)
50 साल का सूखा और 2017 की पहली शादी: यह सच है कि इस गाँव ने लगभग 50 वर्षों तक किसी बारात का स्वागत नहीं किया। इस सन्नाटे को साल 2017 में अजय कुमार यादव ने तोड़ा, जिनकी शादी के बाद आधी सदी का इंतजार खत्म हुआ। इसके बाद कुछ और शादियाँ (जैसे 2021-22 के दौरान) हुईं, लेकिन उनकी संख्या नगण्य है। गाँव में आज भी 120 से अधिक युवा ऐसे हैं जिनकी उम्र शादी की दहलीज पार कर चुकी है।
वजह: भौगोलिक और प्रशासनिक उपेक्षा: गाँव की इस बदहाली का कारण कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि पहुंच (Accessibility) है। यह गाँव कैमूर की पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच स्थित है। यहाँ तक पहुँचने के लिए पहले लोगों को कई किलोमीटर तक पहाड़ों पर पैदल चलना पड़ता था। कोई भी पिता अपनी बेटी को ऐसे दुर्गम स्थान पर नहीं भेजना चाहता जहाँ अस्पताल जाने के लिए भी खटिया पर लादकर मरीज को ले जाना पड़े।
पहाड़ काटकर बनाई खुद की ‘सड़क’: प्रशासन की बेरुखी से तंग आकर यहाँ के युवाओं ने खुद ‘दशरथ मांझी’ बनने का फैसला किया। साल 2008 से 2015 के बीच गाँव वालों ने खुद मेहनत करके पहाड़ों के बीच से करीब 6 किलोमीटर लंबी कच्ची सड़क तैयार की, ताकि कम से कम मोटरसाइकिल और ट्रैक्टर गाँव तक आ सकें। इसी श्रमदान का नतीजा था कि 2017 में यहाँ पहली बार कोई गाड़ी दुल्हन लेकर पहुँची।
विकास की धीमी रफ्तार और वर्तमान स्थिति
बरवां कलां में आज भी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है:
बिजली और पानी: यहाँ बिजली के तार तो पहुँचे हैं, लेकिन आपूर्ति अनियमित है। गर्मियों में हैंडपंप सूख जाते हैं और महिलाओं को पानी के लिए दूर झरनों या कुओं पर निर्भर रहना पड़ता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य: गाँव में केवल प्राथमिक स्तर की शिक्षा की व्यवस्था है। उच्च शिक्षा या इलाज के लिए आज भी शहर जाना एक बड़ी चुनौती है।
रोजगार का अभाव: कृषि ही मुख्य साधन है, लेकिन सिंचाई की सुविधाओं के बिना वह भी केवल जीवन निर्वाह तक सीमित है।
सामाजिक कलंक बन गई है पहचान
गाँव के बुजुर्गों का कहना है कि “कुंवारों का गाँव” नाम अब एक सामाजिक कलंक बन गया है। जैसे ही किसी को पता चलता है कि लड़का बरवां कलां का है, रिश्ते की बात वहीं रुक जाती है। लोग डरते हैं कि उनकी बेटी वहाँ की कठिन जीवनशैली को नहीं झेल पाएगी।
निष्कर्ष : बरवां कलां की कहानी केवल शादियों के न होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के उन सुदूर इलाकों की चीख है जो आज भी विकास की मुख्यधारा से कटे हुए हैं। 2017 की उस पहली शादी ने एक उम्मीद तो जगाई थी, लेकिन जब तक यहाँ पक्की सड़कें, बेहतर अस्पताल और रोजगार नहीं पहुँचते, तब तक यहाँ के युवाओं का ‘दूल्हा’ बनने का सपना अधूरा ही रहेगा।














