Silent Village: भारत का ‘साइलेंट विलेज’, जहां बच्चे पैदा होते हैं गूंगे-बहरे! जानिए इस गांव का चौंकाने वाला सच
खामोशी की गूंज: भारत का वो अनोखा गांव, जहां की हवाओं में शब्दों की नहीं, इशारों की भाषा बहती है

Silent Village : ‘द साइलेंट विलेज ऑफ इंडिया’: जम्मू-कश्मीर के धदकई गांव की वो रहस्यमयी कहानी, जिसे विज्ञान ने ‘अभिशाप’ से हटाकर ‘जेनेटिक सच’ साबित किया
भारत के खूबसूरत केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले की बर्फीली और सुरम्य पहाड़ियों के बीच एक ऐसा गांव बसा है, जिसकी प्राकृतिक सुंदरता तो किसी का भी मन मोह ले, लेकिन इसकी असल पहचान दुनिया भर में बिल्कुल जुदा है। लगभग 260 किलोमीटर दूर पहाड़ी इलाके में बसे इस गांव का नाम है ‘धदकई’। इस गांव को आज पूरी दुनिया ‘द साइलेंट विलेज (Silent Village) ऑफ इंडिया’ (भारत का शांत गांव) के नाम से जानती है। यहाँ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ सन्नाटा पसरा नहीं रहता, बल्कि यहाँ का सन्नाटा आपस में बातें करता है।

Silent Village : क्या है इस गांव की असल हकीकत?
धदकई गांव में मुख्य रूप से गुर्जर मुस्लिम समुदाय के लोग रहते हैं, जो कि अनुसूचित जनजाति (ST) के अंतर्गत आते हैं। करीब 2,000 की आबादी वाले इस छोटे से गांव में रहने वाले लोगों की एक बहुत बड़ी आबादी न तो सुन सकती है और न ही बोल सकती है। वर्तमान में गांव के 90 से अधिक लोग मूक-बधिर (गूंगे-बहरे) हैं, जिनमें खास बात यह है कि महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में अधिक है।
Silent Village गांव के भीतर इस समस्या की गहराई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ रहने वाले 105 परिवारों में से 55 से ज्यादा परिवार ऐसे हैं, जिनके घर में कम से कम एक या उससे अधिक सदस्य मूक-बधिर हैं। कुछ परिवार तो ऐसे भी हैं, जहां 7 बच्चों में से 6 बच्चे जन्म से ही मूक-बधिर पैदा हुए हैं।
Silent Village : अभिशाप या अंधविश्वास नहीं, मेडिकल साइंस का ‘जेनेटिक सच’
सालों तक इस गांव के लोग इसे भगवान का कोई कठोर अभिशाप, बुरी किस्मत का खेल या फिर स्थानीय पानी और मिट्टी का दोष मानते रहे। ग्रामीण इस खामोशी के डर में जीते रहे, लेकिन जब वैज्ञानिकों और डॉक्टरों की विशेष टीमों ने गांव (Silent Village) का दौरा किया और इस पर गहन रिसर्च की, तो एक बेहद चौंकाने वाली मेडिकल वजह सामने आई।
चिकित्सा विज्ञान में इसे ‘जेनेटिक क्लस्टर’ या ‘फाउंडर्स इफेक्ट’ (Founder’s Effect) कहा जाता है।
इनब्रीडिंग और एंडोगेमी: गुर्जर समुदाय के लोग सदियों से अपनी ही जनजाति और बेहद करीबी रिश्तेदारों के भीतर शादियां (Consanguineous Marriages) करते आ रहे हैं। जब एक ही छोटे से जेनेटिक पूल (सीमित DNA संरचना) के लोग आपस में पीढ़ियों दर पीढ़ियों शादियां करते हैं, तो उनके जीन में छिपे हुए सुप्त दोष (Recessive Defects) अगली पीढ़ी में उभरकर सामने आ जाते हैं।
OTOF जीन की गड़बड़ी: वैज्ञानिकों ने जब ग्रामीणों के खून के सैंपल लिए, तो पाया कि इनके शरीर में OTOF (Otoferlin) नाम के जीन में गंभीर म्यूटेशन (गड़बड़ी) है। यह जीन हमारे कान के अंदरूनी हिस्से से दिमाग तक आवाज के सिग्नल भेजने का मुख्य काम करता है। जब माता और पिता दोनों के जरिए बच्चे में यह डिफेक्टिव जीन पहुंचता है, तो बच्चा जन्म से ही बहरा और गूंगा पैदा होता है।
Silent Village : 1901 में शुरू हुआ था यह सिलसिला, साल-दर-साल बढ़ता गया आंकड़ा
Silent Village गांव के बुजुर्गों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के मुताबिक, धदकई गांव में मूक-बधिर बच्चे के जन्म का सबसे पहला मामला साल 1901 में दर्ज किया गया था। तब ‘फौजी गुर्जर’ नाम के एक स्थानीय शख्स के घर एक ऐसा बेटा पैदा हुआ था, जो सुन-बोल नहीं सकता था। उसके बाद से यह तादाद रुकने का नाम नहीं ले रही:
साल 1990: गांव में मूक-बधिर लोगों की संख्या 43 थी।
साल 2007: यह संख्या बढ़कर 79 हो गई।
वर्तमान स्थिति: आज यह आंकड़ा 90 को पार कर चुका है और लगातार नई पीढ़ियों को अपनी चपेट में ले रहा है।
Silent Village : पूरे गांव ने विकसित कर ली अपनी ‘लोकल साइन लैंग्वेज’
इस गांव की सबसे खूबसूरत और भावुक कर देने वाली बात यह है कि यहाँ दिव्यांगता कभी संवाद के आड़े नहीं आती। धदकई के लोगों ने आपस में बातचीत करने के लिए अपनी खुद की एक ‘लोकल साइन लैंग्वेज’ (स्थानीय सांकेतिक भाषा) विकसित कर ली है। हैरान करने वाली बात यह है कि जो लोग पूरी तरह स्वस्थ हैं और सुन-बोल सकते हैं, वे भी इस इशारों की भाषा को इतनी बारीकी और अच्छी तरह से जानते हैं कि पूरा गांव बिना किसी रुकावट या झिझक के आपस में सहजता से बातें कर लेता है। यहाँ शब्दों की कमी को आँखों और हाथों की हरकतें पूरी कर देती हैं।
धदकई गांव आज विज्ञान के लिए एक बड़ी केस स्टडी है, तो वहीं इंसानी जज्बे और एकजुटता की एक अनोखी मिसाल भी है, जहां खामोशी भी खुलकर मुस्कुराती है।