Healthy Dadi 103 साल की ‘निरोगी’ दादी का निधन, जिसे छू न सकी कोई बीमारी, उस ‘फौलादी’ दादी की कहानी
न चश्मा लगा, न याददाश्त धुंधली हुई; आधुनिक चिकित्सा के दावों को धता बता गई यह बुजुर्ग।

Healthy Dadi : गुलामी से लेकर डिजिटल इंडिया तक का सफर देखने वाली आशी देवी छोड़ गईं संस्कारों की अटूट विरासत।
पानीपत। आज के दौर में जहाँ 40 की उम्र पार करते ही इंसान दवाइयों और अस्पतालों के चक्रव्यूह में फंस जाता है, वहीं हरियाणा के पानीपत जिले के सुताना गांव की एक बुजुर्ग महिला ने चिकित्सा विज्ञान के तमाम दावों को अपनी जीवनशैली से चुनौती दे दी। 103 वर्ष की आयु में आशी देवी का निधन न केवल एक परिवार की क्षति है, बल्कि उस ‘निरोगी’ युग के अंत जैसा है जिसका उदाहरण मिलना आज लगभग असंभव है।

विज्ञान के लिए एक पहेली: कभी नहीं देखा अस्पताल का मुंह
आशी देवी के जीवन का सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि अपनी एक सदी से अधिक की लंबी यात्रा में वे कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुईं। उनके बड़े बेटे कर्ण सिंह गर्व से बताते हैं कि मां की सेहत किसी फौलाद जैसी थी। आधुनिक विज्ञान जहाँ कहता है कि उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त और दृष्टि कमजोर होना अनिवार्य है, वहीं 100 साल पार करने के बाद भी आशी देवी की आंखों की रोशनी स्पष्ट थी और उनकी याददाश्त आखिरी समय तक बिजली जैसी तेज बनी रही। चिकित्सा जगत के लिए यह एक शोध का विषय हो सकता है कि कैसे बिना किसी मेडिकल सप्लीमेंट के एक इंसान 103 साल तक पूरी तरह स्वस्थ रह सकता है।
सादा खान-पान: लंबी उम्र का असली ‘सीक्रेट’
आशी देवी की लंबी उम्र और चट्टानी सेहत का राज उनके ग्रामीण जीवन और अनुशासन में छिपा था। उन्होंने ताउम्र बाज़ार के मिलावटी खाने और आधुनिक जीवनशैली की चमक-धमक से दूरी बनाए रखी।
शुद्ध सात्विक आहार: उनका खान-पान पूरी तरह प्राकृतिक था। घर का दूध-दही, शुद्ध घी और मोटे अनाज उनकी डाइट का मुख्य हिस्सा थे।
शारीरिक श्रम: उन्होंने कभी आराम को अपनी आदत नहीं बनाया। 103 की उम्र में भी वे अपने दैनिक कार्य स्वयं करती थीं।
तनाव मुक्त जीवन: 1982 में पति के निधन के बाद उन्होंने अकेले तीन बेटों को पाल-पोसकर बड़ा किया और एक वटवृक्ष की तरह परिवार को संभाला, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी।
आजादी से आधुनिकता तक का सफर
आशी देवी उन विरले लोगों में से थीं जिन्होंने भारत को गुलामी की बेड़ियों में देखा और फिर उसे आधुनिकता के शिखर पर पहुँचते भी देखा। उनके पौत्र सुशील कुमार (HCS अधिकारी) बताते हैं कि उनके संस्कार ही थे कि आज पूरा परिवार समाज में प्रतिष्ठित पदों पर है।
हादसे ने थाम दीं सांसे
विडंबना देखिए, जिस महिला ने 103 साल तक किसी बीमारी को अपने पास फटकने नहीं दिया, एक छोटे से हादसे ने उन्हें कमजोर कर दिया। 11 जनवरी को स्नान के लिए जाते समय पैर फिसलने से उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई। अंततः पानीपत के एक अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अपनी अंतिम सांसें लीं।
उनका जाना एक ऐसे युग का अंत है जहाँ इंसान और प्रकृति के बीच गहरा संबंध था। 21 जनवरी को गांव सुताना में उनकी 13वीं की रस्म होगी, जहाँ पूरा इलाका इस ‘लौह महिला’ को अपनी अंतिम विदाई देगा।
आज के युवाओं के लिए सीख: आशी देवी का जीवन हमें यह सिखाता है कि अगर खान-पान शुद्ध हो और मन में संकल्प, तो शरीर दशकों तक विज्ञान के नियमों को मात दे सकता है।













