Sewer Cleaning के नाम पर फिर से लुटने के लिए तैयार गुरुग्राम ? 270 करोड़ रुपये का बनाया बजट
नगर निगम गुरुग्राम की मेगा योजना पर उठ रहे सवाल; क्या कागजी दावों और अधूरी मशीनों से बदलेगी शहर की सूरत?

Sewer Cleaning : साइबर सिटी गुरुग्राम की किस्मत में शायद सड़कों पर बहता गंदा पानी और सीवर ओवरफ्लो की समस्या स्थायी रूप से लिख दी गई है। नगर निगम गुरुग्राम (MCG) ने एक बार फिर शहर के 1700 किलोमीटर लंबे सीवर नेटवर्क को दुरुस्त करने के नाम पर 270 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट तैयार कर मंजूरी के लिए चंडीगढ़ मुख्यालय भेजा है। निगम का दावा है कि इस मेगा प्लान से 24 घंटे में शिकायतों का समाधान होगा, लेकिन धरातल की हकीकत इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा रही है।
क्या है 270 करोड़ का ‘चमकदार’ प्लान?
नगर निगम की इस योजना के तहत पूरे शहर को चार जोन में बांटा जाएगा और अगले पांच वर्षों के लिए सीवर सफाई और रखरखाव का जिम्मा निजी एजेंसियों को सौंपा जाएगा। योजना में यह शर्त भी जोड़ी गई है कि शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर एजेंसी को समस्या दूर करनी होगी, अन्यथा उन पर जुर्माना लगाया जाएगा। शहर के करीब 33 हजार मैनहोल की जिम्मेदारी भी इन्हीं एजेंसियों के पास होगी।
बजट या बर्बादी: आशंकाओं के घेरे में निगम की योजना
भले ही निगम इसे ‘परमानेंट समाधान’ बता रहा हो, लेकिन जानकारों और शहरवासियों को इसमें सुधार से ज्यादा भ्रष्टाचार और पैसे की बर्बादी की बू आ रही है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं:
1. अधूरी मशीनरी और संसाधनों का अभाव: वर्तमान में निगम के पास संसाधनों की इतनी भारी कमी है कि रोजाना आने वाली 75 से ज्यादा शिकायतों में से केवल 50 फीसदी का ही निपटारा हो पा रहा है। सवाल यह है कि क्या महज निजी कंपनियों को ठेका देने से रातों-रात आधुनिक मशीनें आसमान से टपकेंगी? बिना पर्याप्त सुपर सकर मशीनों और आधुनिक उपकरणों के, 1700 किमी लंबे नेटवर्क की गहराई से सफाई केवल एक कल्पना मात्र लगती है।
2. निजी एजेंसियों की जवाबदेही पर सवाल: गुरुग्राम का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड गवाह है कि निजी एजेंसियों को काम सौंपने के बाद निगम की मॉनिटरिंग सुस्त पड़ जाती है। 24 घंटे में समाधान का दावा पहले भी कई बार किया गया है, लेकिन हकीकत में फाइलें महीनों तक अटकी रहती हैं। आशंका है कि यह 270 करोड़ रुपये का बजट भी पुराने ठेकों की तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगा और जनता को फिर से बदबूदार पानी के बीच रहना पड़ेगा।
3. पुराने गुरुग्राम की अनदेखी: राजेंद्रा पार्क और पुराने गुरुग्राम के अन्य 40 हॉटस्पॉट आज भी सीवर की समस्या से त्रस्त हैं। निगम का कहना है कि उसने लाइनें बदलने का काम शुरू किया है, लेकिन हर मानसून में शहर का ‘टापू’ बनना यह साबित करता है कि योजनाएं केवल फाइलों तक सीमित हैं।
विकास या विनाश?
75 शिकायतों में से 35-40 शिकायतों का लंबित रहना यह दर्शाता है कि सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है। ऐसे में करोड़ों रुपये का नया बजट पास करना ‘पुराने घाव पर नया मरहम’ लगाने जैसा है, जिसकी मियाद बहुत कम है। जब तक निगम अपनी मशीनरी को आधुनिक नहीं करता और भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगाता, तब तक गुरुग्राम के विकास की गाड़ी सीवर के कीचड़ में ही फंसी रहेगी।
निष्कर्ष: नगर निगम की यह 270 करोड़ की योजना क्या वाकई गुरुग्राम को ‘स्मार्ट’ बनाएगी या फिर एक बार फिर जनता की गाढ़ी कमाई सफाई के नाम पर नालों में बहा दी जाएगी? अधूरी तैयारी और पुरानी कार्यशैली के साथ शहर के विकास का दावा करना बेमानी लगता है। जनता अब केवल वादों से नहीं, बल्कि सूखे रास्तों से निगम की सफलता का आकलन करेगी